Sunday, December 5, 2021

मणिपाल हॉस्पीटल्स का कमाल ,अब तक की पहली एबीओ असंगत लीवर ट्रांसप्लांट सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की

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नई दिल्ली। बहु-सुविज्ञता वाली चिकित्सा इकाई, एचसीएमसीटी मणिपाल हॉस्पीटल्स, द्वारका ने हाल में एबीओ असंगत (दान देने और लेने वाला का ब्लड ग्रुप अलग था) लीवर ट्रांसप्लांट सर्जरी पूरी की। यह सर्जरी अफगानिस्तान के 63 साल के मरीज पर की गई और इस तरह उन्हें नया जीवन मिला। यह अपनी तरह का पहला ट्रांसप्लांट है। हेपेटाइटिस बी के कारण मरीज लीवर फेलियर का सामना कर रहा था और इस सर्जरी के लिए खासतौर से भारत आया था। डॉ. शैलेन्द्र लालवानी के नेतृत्व में चिकित्सकों की एक टीम ने यह मुश्किल सर्जरी की और इसके लिए सावधानी पूर्वक तैयार प्रक्रिया का पालन किया गया। डॉ. लालवानी लीवर, ट्रांसप्लांटेशन और हेपैटो -पैनक्रियैटिक बाइलियरी सर्जरी विभाग के प्रमुख हैं।
एबीओ असंगत ट्रांसप्लांट सर्जरी ऐसे मामलों में होती है जब अंग दान करने वाले और अंग प्राप्त करने वालों का ब्लड ग्रुप एक नहीं होता है। इस प्रक्रिया में तैयारियां पहले करने पड़ती हैं – फाइनल सर्जरी से महीने भर पहले ताकि एंटीबॉडी मेडिएटेड रीजेक्शन (एएमआर) से बचा जा सके। इसमें तीन दौर की प्रक्रिया होती है ताकि एंटीबॉडी के लक्ष्य का स्तर हासिल कर सकें। पहले राउंड में मरीज को एंटी-सीडी20 दी जाती है ताकि एंटीबॉडी तैयार करने वाले प्लाज्मा सेल का निर्माण रोका जा सके। दूसरा चरण बाकी बचे एंटी बॉडी को न्यूट्रलाइज करने के लिए होता है। तीसरा चरण प्लाज्मा फिलट्रेशन का होता है ताकि मरीज के शरीर से एंटीबॉडीज हटाए जा सकें। लक्ष्य स्तर हासल करने के बाद ट्रांसप्लांट या प्रत्यारोपण किया जाता है।
मरीज 24 साल के अपने बेटे और बेटी के साथ आया था और मणिपाल हॉस्पीटल्स में उसे डॉ. लालवाणी के समक्ष पेश किया गया। अच्छी तरह जांच करने के बाद डॉ. लालवाणी ने एबीओ असंगत ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया। मरीज का बेटा दान देने वाला था। सर्जरी से पहले एंटी बॉडीज को हटाने के लिए सघन उपचार किया गया ताकि खारिज किए जाने का जोखिम न्यूनतम किया जा सके। सर्जरी आराम से हो गई और खास बात नहीं हुई। मरीज को 5 जुलाई 2021 को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। मामले की सघन प्रकृति के कारण डॉ. शैलेन्द्र लालवानी, लीवर, ट्रांसप्लांटेशन और हेपैटो -पैनक्रियैटिक बाइलियरी सर्जरी विभाग के प्रमुख हैं। उनकी टीम ने इस सर्जरी की बहुत बारीकी से बनाई गई योजना के अनुसार अंजाम दिया।
प्रक्रिया की चर्चा करते हुए डॉ. शैलेन्द्र लालवाणी, एचओडी, लीवर, ट्रांसप्लांटेशन एंड हेपैटो -पैनक्रियैटिक बाइलियरी सर्जरी ने कहा, “एबीओ असंगत लीवर प्रत्योरापण सर्जरी एक उलझी हुई प्रक्रिया है। इसमें मेडिकल सुविज्ञता, संरचना, ऑपरेशन के बाद अच्छी देख-भाल और संक्रमण मुक्त माहौल की आवश्यकता होती है। मरीज के परिवार में समान ब्लड ग्रुप वाला दानकर्ता नहीं था इसलिए हमलोगों ने इस प्रक्रिया का चुनाव किया। ट्रांसप्लांट की आवश्यकता से संबंधित निर्णय लीवर की स्थिति उसके हो चुके नुकसान को जानने समझने के बाद लिया जाता है। हमें यह एलान करते हुए खुशी हो रही है कि 12 घंटे की सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी हुई तथा मरीज हर दिन बेहतर हो रहा है। इस प्रक्रिया के बाद मरीज को ठीक होने में तीन हफ्ते लगते हैं पर हमारा मरीज दो हफ्ते में ही ठीक हो गया। और कुछ ही हफ्ते में उसे डिस्चार्ज कर दिया गया।”

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